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दो संतान नियम: सुप्रीम कोर्ट ने 2003 का फैसला बड़ी बेंच को भेजा

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फाइल फोटो: सुप्रीम कोर्ट परिसर, नई दिल्ली। चित्र साभार: Pinakpani / Wikimedia Commons, CC BY-SA 4.0

फाइल फोटो: सुप्रीम कोर्ट परिसर, नई दिल्ली। चित्र साभार: Pinakpani / Wikimedia Commons, CC BY-SA 4.0

सार: सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार, 4 नवंबर 2026 को कहा कि दो से ज्यादा संतान होने पर स्थानीय निकाय चुनाव लड़ने से अयोग्य ठहराने वाले कानून देश की घटती प्रजनन दर के कारण अपनी प्रासंगिकता खो चुके हैं। जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की बेंच ने 2003 के ‘जावेद बनाम हरियाणा राज्य’ फैसले पर पुनर्विचार के लिए मामला बड़ी बेंच को भेज दिया।

दो संतान नियम: कोर्ट ने क्या कहा

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार फैसला सुनाते हुए जस्टिस नरसिम्हा ने कहा कि ऐसे कानूनों की नींव, यानी अधिक जनसंख्या का डर, पिछले कुछ दशकों के जनसांख्यिकीय बदलावों से ढह गई है। (अंग्रेजी से अनुवाद)

बेंच ने कहा कि 2003 में जब जावेद फैसले में ऐसे कानूनों को सही ठहराया गया था, तब देश की कुल प्रजनन दर (TFR) 3 थी, जो अब घटकर 1.9 रह गई है। यह 2.1 की प्रतिस्थापन दर से कम है।

कोर्ट के अनुसार प्रजनन दर प्रतिस्थापन स्तर से नीचे जाने से आने वाले समय में बुजुर्ग आबादी बढ़ेगी और कामकाजी उम्र के लोगों का हिस्सा घटेगा।

जावेद फैसले के तर्क पर सवाल

बेंच ने कहा कि ऐसे कानून नागरिकों के एक पूरे वर्ग को राजनीतिक प्रतिनिधित्व से बाहर करते हैं, जबकि ऐसी अयोग्यता का सार्वजनिक पद संभालने की क्षमता से खास संबंध नहीं है। कोर्ट के अनुसार यह संतान और लोकतांत्रिक भागीदारी के बीच चुनाव के लिए मजबूर करता है, जो अनुच्छेद 21 के तहत प्रजनन संबंधी स्वायत्तता के अधिकार पर असर डालता है।

2003 के जावेद फैसले में सुप्रीम कोर्ट की तीन जजों की बेंच ने हरियाणा पंचायती राज अधिनियम, 1994 के उस प्रावधान को सही ठहराया था, जिसमें दो से ज्यादा जीवित संतान वाले लोगों को पंचायत चुनाव लड़ने से अयोग्य माना गया था।

महाराष्ट्र की पूर्व सरपंच का मामला

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार यह मामला महाराष्ट्र की काकोड़ा ग्राम पंचायत की पूर्व सरपंच मंगला भीमराव से जुड़ा था। तीसरी संतान होने पर महाराष्ट्र ग्राम पंचायत अधिनियम, 1959 के तहत उन्हें अयोग्य ठहराया गया था और बॉम्बे हाईकोर्ट ने भी यह अयोग्यता बरकरार रखी थी।

रिपोर्ट्स के अनुसार सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने उनकी अयोग्यता रद्द कर दी।

किन राज्यों में लागू है नियम

अदालत की सहायता के लिए नियुक्त न्यायमित्र (एमिकस क्यूरी) रुक्मिणी बोबडे के संकलन के अनुसार सात राज्य यह नियम खत्म कर चुके हैं और 15 राज्यों में ऐसी कोई नीति नहीं है। असम, गोवा, गुजरात, महाराष्ट्र, ओडिशा और उत्तराखंड जैसे राज्यों में यह नियम अब भी लागू है।

ऐसे कानूनों की संवैधानिक वैधता पर अंतिम फैसला अब सुप्रीम कोर्ट की बड़ी बेंच करेगी।

स्रोत: PTI/एजेंसियां व प्रमुख मीडिया रिपोर्ट्स के आधार पर NEWS INDIA 24×7 की मूल रिपोर्ट।

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